Monday, February 20, 2017

उलझन

आज कुछ लिखने को जी चाहता है
पर क्या लिखूं समझ नहीं आ रहा

क्या लिखूं ऐ जिंदगी कि बहुत उदास हूँ तेरी महफ़िल में??
या लिखू कि तन्हा भटक रहा हूँ तेरे दुनिया के मेले में ??

आज कहने को जी चाहता है
क्या कहूँ समझ नहीं आ रहा

क्या कहूँ कि खत्म होती जा रही है मेरी मशुमियत
बढ़ती उम्र के साथ ??
या कहूँ कि बनावटी होता जा रहा हूँ मैं भी
बदलते वक़्त के साथ ??

आज कुछ भूलने को जी चाहता है
क्या भूलूँ समझ नहीं आ रहा

क्या भूलूँ ऐ जिंदगी कि कराई है पहचान रास्तों की तूने
कई ठोकरों के बाद ??
या भूल जाऊँ कि सम्भाला भी तूने ही था मुझे
गिरने के बाद ??

आज कुछ मांगने को जी चाहता है
क्या माँगूं समझ नहीं आ रहा

क्या माँगूं तुझसे ऐ ख़ुदा
दौलत माँगूं शोहरत माँगूं
या माँगूं महफ़िल यारों की ??
बुलंदी माँगूं कामयाबी माँगूं
या माँगूं शुकुन माँ के आँचल की ??

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