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Monday, February 20, 2017

उलझन

आज कुछ लिखने को जी चाहता है
पर क्या लिखूं समझ नहीं आ रहा

क्या लिखूं ऐ जिंदगी कि बहुत उदास हूँ तेरी महफ़िल में??
या लिखू कि तन्हा भटक रहा हूँ तेरे दुनिया के मेले में ??

आज कहने को जी चाहता है
क्या कहूँ समझ नहीं आ रहा

क्या कहूँ कि खत्म होती जा रही है मेरी मशुमियत
बढ़ती उम्र के साथ ??
या कहूँ कि बनावटी होता जा रहा हूँ मैं भी
बदलते वक़्त के साथ ??

आज कुछ भूलने को जी चाहता है
क्या भूलूँ समझ नहीं आ रहा

क्या भूलूँ ऐ जिंदगी कि कराई है पहचान रास्तों की तूने
कई ठोकरों के बाद ??
या भूल जाऊँ कि सम्भाला भी तूने ही था मुझे
गिरने के बाद ??

आज कुछ मांगने को जी चाहता है
क्या माँगूं समझ नहीं आ रहा

क्या माँगूं तुझसे ऐ ख़ुदा
दौलत माँगूं शोहरत माँगूं
या माँगूं महफ़िल यारों की ??
बुलंदी माँगूं कामयाबी माँगूं
या माँगूं शुकुन माँ के आँचल की ??

Tuesday, October 9, 2012

कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए

भरी महफ़िल में बदनाम हो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए

ओ बेवफा तुने ये क्या किया
मेरी चाहतों का ये कैसा सिला दिया
तेरे प्यार में हम, क्या से क्या हो गए
कभी मशहूर थे आज गुमनाम हो गए

चाह था तुझे मैंने जान से भी ज्यादा
तेरे संग जिंदगी बिताने का था इरादा
ना मंजिल ही पाई मैंने, ना तुझे ही पा सके
इन राहों पे चलते-चलते, हम मंजिल से दूर हो गए
अरमां जो थे दिल के, सब चूर हो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए

तुमने जो मुझे तनहा छोड़ दिया
खुशियों ने भी मेरी, मुझसे मुह मोड़ लिया
तन्हा यूँ जीने का मुझको नहीं कोई अरमान है
मेरे जीवन में अब बची नहीं मुस्कान है
मुस्कान मेरे जाने कहाँ खो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए

भरी महफ़िल में बदनाम हो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए 

बहुत बढ़ गयी है मंगाई, लेकिन नहीं बढ़ी कमाई


आज सबेरे जब दफ्तर मैं पहुंचा
बॉस मेरा मुझसे पहले था आ बैठा
हाँथ जोड़ कर मैंने किया नमस्ते
हुयी देर क्यों बदले में उन्होंने पूछा
तब मैंने अपनी व्यथा सुनाई
श्रीमान बहुत बढ़ गयी है मंगाई
लेकिन नहीं बढ़ी कमाई
समय से निकला था मैं घर से
लेकिन बहुत देर एक ऑटो आई
बैठा जल्दी - जल्दी में मैं
कही बैठ ना जाये दूसरा कोई भाई
ऑटो चला वहाँ से
लेकिन उनसे थोड़ी देर लगायी
मेरे अलावा ऑटो के अन्दर बैठी थी एक बूढी माई
कुछ चलने के बाद उन्होंने ऑटो रुकवाई
निकाला बटुआ और दिए कुछ पैसे
ऑटो वाले ने कहा ये क्या दे रही हो
और पैसे दो माई
माई बोली और क्यों दूँ
इतनी ही अब तक मैं देती आई
ड्राइवर बोला बात सही है तेरी माई
लेकिन देखो कितनी बढ़ गयी है मंहगाई
डीजल महंगा, गैस भी महंगा
राशन वाले ने भी दाम बढ़ाई
बिजली महंगी, पानी मंहगा
शब्जी वाले ने भी रेट बढ़ाई
बस कर, बस कर ये ले पैसे
बूढी माई ने फिर मुह बनायीं
दिया पैसे फिर गिन - गिन कर
लेकिन उन्होंने बहुत देर लगायी
उनकी भी नहीं है गलती कोई
श्रीमान बहुत बढ़ गयी है मंगाई
लेकिन नहीं बढ़ी कमाई
बॉस मेरा खामोश रहा
कुछ कहते ना उनसे बना
कहते भी मुझसे क्या
श्रीमान बहुत बढ़ गयी है मंगाई
लेकिन नहीं बढ़ी कमाई

Saturday, September 29, 2012

बंदिश-ए-जिंदगी

आज फिर शरारत करने को दिल चाहता है
बंदिश-ए-जिंदगी मगर इसकी इजाजत नहीं देती

बिताना चाहता हूँ फिर रात तारों की छाँव में
उस नीले गगन के निचे
ये छत मगर किसी और का है

झूम लेना चाहत हूँ रिमझिम बरसती फुहार में
झूठी शान-ओ-शोकत मगर इसकी इजाजत नहीं देती


रंगीनियाँ ही रंगीनियाँ है इस शहर के चप्पे - चप्पे में
इस दिले-ए-नादान से गाँव की  गलियाँ भुलाई नहीं जाती


सोचता हूँ लौट आऊं फिर उन्ही गांव की गलियों में
तमन्ना-ए-बुलंदी मगर इसकी इजाजत नहीं देती

आज फिर शरारत करने को दिल चाहता है
बंदिश-ए-जिंदगी मगर इसकी इजाजत नहीं देती

Thursday, September 6, 2012

तेरे लौट आने की आश लिए बैठा हूँ मैं


ख्याल जब भी आता है तेरा
तो मचल जाता हूँ  मै

खंजर जब चलते है तेरी यादों के
तो संभल नहीं पता हूँ मैं

ये इश्क नहीं तो और क्या है ?
क्यों पल - पल तेरे बारे में सोचता हूँ मैं

भले ही खबर ना हो तुझे
ख्वाबों में भी अक्सर आवाज लगता हूँ मैं

अगर यकीं नहीं है तो, अपनी सखियों से पूछो
तेरी गांव की गलियों में, उस पनघट किनारे
कुछ पल रोज बिताता हूँ मैं

जिंदगी जो बची है कुछ पल की
तेरी यादों में गुजरता हु मैं

ये कहते है यार मेरे
तू हो चुकी है किसी और की
मगर फिर भी
तेरे लौट आने की आश लिए बैठा हूँ मैं