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Saturday, August 10, 2019

पगडंडी



एक अरसे बाद कुछ लिखा है मैने आओ तुम्हे सुनाता हूँ
मेरे गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी से तुम्हे मिलता हूँ

ये पगडंडी है जीवन की
रखना संभल-संभल के कदम

माना ये राह है मुश्किल, आसान नही है
सरपट दौड़ती पक्की सड़को के समान नही है
ठोकर कभी लग जाएंगे
तो कभी लड़खड़ा जाएंगे कदम
जैसे जीवन मे कुछ पाना
यारों इतना आसान नही है

चलना इनपे जो सिख लिया तो
मंजिल चूमेंगी तेरे कदम
जैसे झुक जाता है दूर कंही
धरती से मिलने ये नीला गगन

ये है जैसे हांथों की रेखा
सिमटी है जिसमे  किस्मत का लेखा
हर कोई जिसे समझ पाता नही

ये पगडंडी है जीवन की
टेढ़ी-मेढ़ी, उलझी-सुलझी
जैसे भ्रम जाल कोई
समझना अगर चाहोगे तो
मिलेंगे जीवन के रहस्य कई
गौर से देखो अगर इनको
तो
हृदय धमनियों को सुचारू रखने को
रक्त प्रवाहित करती जैसे हो  नब्ज कोई


ये बाँटें भले किनारें
मत समझो तुम इन्हें दरारें
ये ना हो तो जीवन फसल को
ले बह जाएं पानी की धारें.............

Monday, February 20, 2017

उलझन

आज कुछ लिखने को जी चाहता है
पर क्या लिखूं समझ नहीं आ रहा

क्या लिखूं ऐ जिंदगी कि बहुत उदास हूँ तेरी महफ़िल में??
या लिखू कि तन्हा भटक रहा हूँ तेरे दुनिया के मेले में ??

आज कहने को जी चाहता है
क्या कहूँ समझ नहीं आ रहा

क्या कहूँ कि खत्म होती जा रही है मेरी मशुमियत
बढ़ती उम्र के साथ ??
या कहूँ कि बनावटी होता जा रहा हूँ मैं भी
बदलते वक़्त के साथ ??

आज कुछ भूलने को जी चाहता है
क्या भूलूँ समझ नहीं आ रहा

क्या भूलूँ ऐ जिंदगी कि कराई है पहचान रास्तों की तूने
कई ठोकरों के बाद ??
या भूल जाऊँ कि सम्भाला भी तूने ही था मुझे
गिरने के बाद ??

आज कुछ मांगने को जी चाहता है
क्या माँगूं समझ नहीं आ रहा

क्या माँगूं तुझसे ऐ ख़ुदा
दौलत माँगूं शोहरत माँगूं
या माँगूं महफ़िल यारों की ??
बुलंदी माँगूं कामयाबी माँगूं
या माँगूं शुकुन माँ के आँचल की ??

Saturday, February 27, 2016

पलकों में तुम्हे सजायेंगे हम


तबस्सुम में मेरे कभी आओ तो तुम
लम्हा कोई साथ बिताओ तो तुम
पलकों में तुम्हे सजायेंगे हम
सांसो में अपने बसाएंगे हम
मिट जायेंगे ये फैसले खुद ही
कभी दो कदम तो  तुम

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Saturday, August 8, 2015

क्या हुआ अगर हम मुस्कुरा न सकें....


तुझे इल्जाम दूँ कैसे मेरी जिंदगी
जरूर कमी मुझ में ही रही होगी ।।

यूँ बेवजह तो ठोकर लगा करती नहीं
जरूर आँखें मेरी ही बंद रही होंगी ।।

तू मुझसे जुदा हो गयी
या कोई और तेरे करीब आ गया,
इसमें खता तेरी नहीं
जरूर मैं ही तुझे अपना बना न सका ।।

हँसती - खिलखिलाती रहे तू खुदा करे
क्या हुआ जो हम मुस्कुरा न सके ।।

Friday, January 25, 2013

बेटी है तो कल है

माँ, बीवी और बहन है बेटी
घर - आँगन और जीवन जो महका देती
सुगन्धित फूलों का वो उपवन है बेटी


















कली सी कोमल, फूलों सी नाजुक
प्रकृति का अनमोल सृजन है बेटी

नीरस से वीरान जीवन में
सुर की गंगा जो बहा देती
सात सुरों का सरगम है बेटी

जब छाता जीवन घनघोर अँधेरा
और नजर न आती रह कोई
तब उम्मीद की आखिरी किरण है बेटी

दुःख संताप की कठिन घडी में
मुस्काता दर्पण है बेटी

बिन बेटी संभव नहीं है
कर पाना इस सृष्टि की कल्पना
बीज अंकुरित होता जहाँ से जीवन का
वो धरा वो गगन है बेटी

बोझ नहीं ये पाप नहीं
जन्म जन्मों के शुभ कर्मों ये तो फल है
बेटी है तो कल है
बेटी है तो कल है

Thursday, January 24, 2013

बेटी नहीं अभिशाप है


क्या कुसूर है उस नन्ही सी जान का ??
उसका तो नहीं अभी इस दुनिया में जान पहचान का














दे रहे हो उसे सजा किस बात की ??
उसे तो जरुरत है तुम्हारे ममता  भरे हाँथ की

खुद पर करो थोड़ी सी  शर्म
उस नन्ही जान पर करो कुछ तो रहम

दो मौका इसे पलने बढ़ने का
ये तो है एक नन्ही कली
दो मौका इसे खिलने का

आज बगिया तुम्हारी महकाएगी
कल एक नयी दुनिया को भी सजाएगी

जग में जो ये आ जाएगी
तो तेरा ही मान बढ़ाएगी

पहुचेगी कोई चाँद पर तो
तो कोई हिमालय पर तिरंगा लहराएगी

बेटी नहीं अभिशाप है
जीवनचक्र की एक शाख है

देखा नहीं उसने तो अभी चेहरा आज का
क्यों बना रहे उसे तुम पन्ना इतिहास का

Thursday, December 27, 2012

हम युवा ही असली शक्ति है


हम पानी में आग लगा सकते हैं,
हम पत्थर पे फूल खिला सकते हैं,
हम बदल सकते है तक़दीर तुम्हारी,
झुका सकते है क़दमों में दुनिया सारी,

हम युवा ही असली शक्ति है,
बाकी सब तो मिटटी है.
युवा ही था वो वीर भगत, सुखदेव और राजगुरु
श्रधा से हर शीस जिसके आगे झुकती है

याद करो उस खुदीराम,
अंग्रेजो ने फंसी पर जिसे चढ़ाया था,
उम्र थी केवल 19 की,
आजादी की अलख उसने जगाया था.

हमने जो एक बार ठान लिया तो
कुछ भी हम कर जाते है
चट्टानों के सीनों को भी,
चिर के राहे हम बनाते है,

हम पानी में आग लगा सकते हैं
हम पत्थर पे फूल खिला सकते हैं
हम युवा ही असली शक्ति है
बाकी सब तो मिटटी है.

Sunday, December 2, 2012

घर का आँगन


आज कहाँ वो घर का आँगन
जो अंतहीन सा लगता था ???
कभी क्रिकेट तो कभी कबड्डी
का मैदान जो बनता था

हर घर की चारदीवारी में
एक नया जहान सा बसता था
दादा-दादी, मम्मी-पापा,
चाचा-चची, दीदी-बुआ
चहू दिशा से घर का हर दरवाजा
आ कर वही खुलता था

सर्दी की सुबह हो या
गर्मी की रातें
या फिर हो सावन की बरसातें
हर मौसम वही गुजरता था

गूंजता करता था देवर-भाभी की हास्य बम
तो सास-बहु, नन्द-भाभी में
शीत युद्ध भी होता था
आफत सी मच जाती थी घर में
जब बच्चा कोई रोता था

तब होता था एक बूढ़ा चापाकल
जो प्यास सभी की बुझाता था
जलता था एक ही मिटटी का चूल्हा
पर भूखा नहीं कोई सोता था

आँगन नहीं वो एक धुरी थी
जो हमको बांधे रखता था
धीरे-धीरे घटता गया
टुकड़ों में बांटता गया

आज कहाँ वो घर का आँगन
जो अंतहीन सा लगता था ????

Friday, November 16, 2012

जय जय जय श्री चित्रगुप्त भगवान !


जय जय जय श्री चित्रगुप्त भगवान!
परम पिता तुम परमेश्वर मेरे
हम तेरे बालक नादान
हाँथ जोड़ कर हम करे वंदना
ना देना हमे बल और शोहरत
ना देना धन-धान्य
सत्य उअर धरम की राह चले हम
ध्येय हो जनकल्याण
प्रभु देना हमे ये वरदान
जय जय जय श्री चित्रगुप्त भगवान !!

श्याम वर्ण, तुम श्वेताम्बर धारी
हाँथ तुम्हारे ना खडग, ना कमंडल
ना तीर तलवार
धर्मराज के तुम हो सहायक
कलम - दावत है पहचान
सुर - असुर, नर - मुनि, जिव - प्राणी
धर्म - कर्म का लेखा रखते सबका एक सामान
एक परम पिता हो तुम सबके
भानु, विभानु, विश्व्भानु, विर्यभानु
चारु, सुचारू, चित्राख्य, और मतिमान
हिमवान, चित्रचारु, अरुणा, जितन्द्री सब तेरे संतान
जय जय जय श्री चित्रगुप्त भगवान !!

ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः नमः नमः

Sunday, November 11, 2012

दिवाली वो बचपन वाली

याद है आज भी दिवाली वो बचपन वाली
सजता था सवारता था घर का कोना - कोना
और माँ बनती थी रंगोली सात रंगों वाली

याद है आज भी दिवाली वो बचपन वाली
जगमग - जगमग  दीपों से
माँ सजाती थी थाली

याद है आज भी दिवाली वो बचपन वाली
दिए से दिए जलते थे
और बन जाती थी दीपावली

याद है आज भी दिवाली वो बचपन वाली
गली-चौबारे या हो घर का आँगन
हर जगह होते थे रौशन दिए वो मिटटी वाले

याद है आज भी दिवाली वो बचपन वाली
सुबह से होता था इन्तेजार शाम का
कब नए कपडे पहन हम खेलेंगे लुक्यारी

याद है आज भी दिवाली वो बचपन वाली
तरह - तरह के पकवान थे बनते
हमारे नजरो में होता था
बम,पटाखे,फुलझड़ी
और मिठाईयों से सजी प्रसाद की थाली

अब सब एक सपना सा लगता है
आज कहाँ है दिवाली वो बचपन वाली
और कहाँ घरौंधे वो मिटटी वाले ??



Monday, November 5, 2012

बदलती जिंदगी

जिंदगी बदल रहा, रास्ते बदल रहे
और बदल रहा कारवां ।

बदल रही है दोस्ती, बदल रहा है प्यार भी 
और बदल रहा है ये जहाँ ।

अपने ही लगे है अब पीठ में खंजर घोपने,
हर कोई लगा है अब पेड़ साजिशों के रोपने,
इस जिंदगी का अर्थ क्या ? और है अंजाम क्या ?

यादें भी बदल रहे है, वादे भी बदल रहे है
और बदल रहा है दास्ताँ ।

ये जिंदगी अब खेल और इंसान खिलौना बन कर रहा गया ।
जिसे जी में आता खेलता है, फिर तोड़ खिलौना चल दिया ।।
बदल रहा सोच भी, बदल रहे लोग भी 
और बदल रही ये दुनिया ।

जिंदगी बदल रहा, रास्ते बदल रहे 
और बदल रहा कारवां ।।

Friday, October 12, 2012

जाने क्या होगा इस देश का...??

जहाँ मंहगा डीजल, महंगी गैस
नेताओं की हो रही पूरी ऐश
जाने क्या होगा इस देश का ??

कहीं कई दिनों से नहीं जले है चूल्हे
नित सामने आते नए घोटाले
जाने क्या होगा इस देश का ??


खुले है नाले, सड़कों का है खस्ता हाल
फिर भी हो रहा भारत निर्माण
जाने क्या होगा इस देश का ??

सुबह खाए तो पड़े भूखा रात को सोना 
गोदामों में सड़ रहा अनाज
जाने क्या होगा इस देश का ??

कहीं पर सुखा कहीं अकाल
नेता हो रहे माला माल
जाने क्या होगा इस देश का ??

जनता मांगे रोजी रोजगार
मोबाईल बांटने चली सरकार
जाने क्या होगा इस देश का ??

कार्टून बनाना हुआ अपराध
बलात्कार हुआ साधारण सी बात
जाने क्या होगा इस देश का ??

चारो तरफ मचा है हाहाकार
लोकतंत्र पर से उठ गया विश्वास
जाने क्या होगा इस देश का ??

Tuesday, October 9, 2012

कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए

भरी महफ़िल में बदनाम हो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए

ओ बेवफा तुने ये क्या किया
मेरी चाहतों का ये कैसा सिला दिया
तेरे प्यार में हम, क्या से क्या हो गए
कभी मशहूर थे आज गुमनाम हो गए

चाह था तुझे मैंने जान से भी ज्यादा
तेरे संग जिंदगी बिताने का था इरादा
ना मंजिल ही पाई मैंने, ना तुझे ही पा सके
इन राहों पे चलते-चलते, हम मंजिल से दूर हो गए
अरमां जो थे दिल के, सब चूर हो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए

तुमने जो मुझे तनहा छोड़ दिया
खुशियों ने भी मेरी, मुझसे मुह मोड़ लिया
तन्हा यूँ जीने का मुझको नहीं कोई अरमान है
मेरे जीवन में अब बची नहीं मुस्कान है
मुस्कान मेरे जाने कहाँ खो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए

भरी महफ़िल में बदनाम हो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए
कभी मशहूर थे, आज गुमनाम हो गए 

बहुत बढ़ गयी है मंगाई, लेकिन नहीं बढ़ी कमाई


आज सबेरे जब दफ्तर मैं पहुंचा
बॉस मेरा मुझसे पहले था आ बैठा
हाँथ जोड़ कर मैंने किया नमस्ते
हुयी देर क्यों बदले में उन्होंने पूछा
तब मैंने अपनी व्यथा सुनाई
श्रीमान बहुत बढ़ गयी है मंगाई
लेकिन नहीं बढ़ी कमाई
समय से निकला था मैं घर से
लेकिन बहुत देर एक ऑटो आई
बैठा जल्दी - जल्दी में मैं
कही बैठ ना जाये दूसरा कोई भाई
ऑटो चला वहाँ से
लेकिन उनसे थोड़ी देर लगायी
मेरे अलावा ऑटो के अन्दर बैठी थी एक बूढी माई
कुछ चलने के बाद उन्होंने ऑटो रुकवाई
निकाला बटुआ और दिए कुछ पैसे
ऑटो वाले ने कहा ये क्या दे रही हो
और पैसे दो माई
माई बोली और क्यों दूँ
इतनी ही अब तक मैं देती आई
ड्राइवर बोला बात सही है तेरी माई
लेकिन देखो कितनी बढ़ गयी है मंहगाई
डीजल महंगा, गैस भी महंगा
राशन वाले ने भी दाम बढ़ाई
बिजली महंगी, पानी मंहगा
शब्जी वाले ने भी रेट बढ़ाई
बस कर, बस कर ये ले पैसे
बूढी माई ने फिर मुह बनायीं
दिया पैसे फिर गिन - गिन कर
लेकिन उन्होंने बहुत देर लगायी
उनकी भी नहीं है गलती कोई
श्रीमान बहुत बढ़ गयी है मंगाई
लेकिन नहीं बढ़ी कमाई
बॉस मेरा खामोश रहा
कुछ कहते ना उनसे बना
कहते भी मुझसे क्या
श्रीमान बहुत बढ़ गयी है मंगाई
लेकिन नहीं बढ़ी कमाई

Monday, October 8, 2012

माँ है तेरा आशीष बहुत



क्यों इतने दुःख सहती है ??
क्यों इतने कष्ट तू सहती  ??

माँ है तेरा आशीष बहुत 
जो हर संकट से मुझे बचाती है 

माँ तू मेरे लिए 
क्यों व्रत नए तू रखती है ??

देख के तुझको पीड़ा में 
दिल मेरा माँ रोता है 

धिक्कारता है मुझको मेरा मन 
कैसे चैन से तू सोता है ?

क्यों इतने दुःख सहती है ??
क्यों इतने कष्ट तू सहती ??

पा लेता हू जन्नत का सुख 
जब सर मेरा तू सहलाती है  

दूर हो जाती हर बाधा परेशानी 
जब गले तू मुझको लगाती है 

फिर माँ तू मेरे लिए 
क्यों व्रत नए तू रखती है ??

क्यों इतने दुःख सहती है ??
क्यों इतने कष्ट तू सहती है ??

Sunday, October 7, 2012

दोराहे पर खड़ा हूँ मैं


दोराहे पर खड़ा हूँ मैं
समझ में ना आये किधर को जाऊ
इधर को जाऊ या उधर को जाऊ
आखिर मैं किधर को जाऊ

ना कोई साथी ना हमसफ़र है
किसको मैं हमराह बनाऊ
मंजिल मेरी दूर बहुत है
और बढ़ी मुश्किल इसकी डगर है

सफ़र अकेला कटेगा कैसे
कैसे मिलेगी मंजिल मुझको

साथी मिले थे राहों में जो
किसी मोड़ पर छुट गए है
भटक गया हूँ राह मैं या
वो मुझसे रूठ गए है

एक राह में जज्बातों की
एक रहा है अरमानो की
इस दुविधा घिरा हुआ हूँ
आखिर किस राह को अपनाऊ

दोराहे पर खड़ा हूँ मैं
समझ में ना आये किधर को जाऊ
इधर को जाऊ या उधर को जाऊ
आखिर मैं किधर को जाऊ

Saturday, September 29, 2012

बंदिश-ए-जिंदगी

आज फिर शरारत करने को दिल चाहता है
बंदिश-ए-जिंदगी मगर इसकी इजाजत नहीं देती

बिताना चाहता हूँ फिर रात तारों की छाँव में
उस नीले गगन के निचे
ये छत मगर किसी और का है

झूम लेना चाहत हूँ रिमझिम बरसती फुहार में
झूठी शान-ओ-शोकत मगर इसकी इजाजत नहीं देती


रंगीनियाँ ही रंगीनियाँ है इस शहर के चप्पे - चप्पे में
इस दिले-ए-नादान से गाँव की  गलियाँ भुलाई नहीं जाती


सोचता हूँ लौट आऊं फिर उन्ही गांव की गलियों में
तमन्ना-ए-बुलंदी मगर इसकी इजाजत नहीं देती

आज फिर शरारत करने को दिल चाहता है
बंदिश-ए-जिंदगी मगर इसकी इजाजत नहीं देती

Thursday, September 6, 2012

तेरे लौट आने की आश लिए बैठा हूँ मैं


ख्याल जब भी आता है तेरा
तो मचल जाता हूँ  मै

खंजर जब चलते है तेरी यादों के
तो संभल नहीं पता हूँ मैं

ये इश्क नहीं तो और क्या है ?
क्यों पल - पल तेरे बारे में सोचता हूँ मैं

भले ही खबर ना हो तुझे
ख्वाबों में भी अक्सर आवाज लगता हूँ मैं

अगर यकीं नहीं है तो, अपनी सखियों से पूछो
तेरी गांव की गलियों में, उस पनघट किनारे
कुछ पल रोज बिताता हूँ मैं

जिंदगी जो बची है कुछ पल की
तेरी यादों में गुजरता हु मैं

ये कहते है यार मेरे
तू हो चुकी है किसी और की
मगर फिर भी
तेरे लौट आने की आश लिए बैठा हूँ मैं

Sunday, September 2, 2012

कशमकश


मेरी भी चाहत वही थी, जो तेरी ख्वाईश थी 
मचल रहे थे दो दिल अरमानो के तूफान लिए 
पर ना तुम कुछ कह सके, ना मेरे ही लब हिले 

हो रही थी बातें आँखों आँखों में

बेजुबान हम घंटों बैठे रहे, जैसे कि हो हमारे लब सिले 

छाई थी बड़ी गहरी ख़ामोशी 

इंतजार तुम्हे था मेरे कुछ कहने का, 
मै सोच रहा था कि शायद तुम कुछ कहो 

लब खामोश दिल बैचैन 

और चाहत थी कि तुम युहीं सामने बैठी रही 

फासले जो थे हमारे दरमियाँ, वो बस वक्त की जोर आजमाईश थी 

न हम कदम बढ़ा सके, ना एक कदम तुम चल सके ||

Sunday, October 30, 2011

पगली सी लड़की

आज सबेरे जब खिड़की से देखा 
मौसम बड़ा सुहाना था
ऐसे मौसम को देख कर 
जरुरी याद किसीका आना था 
एक अल्हड सी, पगली सी लड़की 
नटखट सी, शर्मीली सी लड़की
मेरे पड़ोस में रहती थी
उम्र थी उसकी 19  की 
पर हरकत बच्चों सी वो करती थी
शाम सबेरे चुपके - चुपके 
दूर से देखा करती थी
रोज सबेरे किसी ना किसी बहाने 
घर भी आया करती थी
कहना था शायद उसको
जाने क्यों ना कह पाती थी
एक अल्हड सी, पगली सी लड़की 
नटखट सी, शर्मीली सी लड़की
मेरे पड़ोस में रहती थी
 ताकता रहता था मै भी उसको 
उसकी हर अदा का मै दीवाना था
घंटों बैठ सड़क किनारे
इंतजार मै उसका करता था
जिस सड़क से उसका आना जाना था
तकते रहना दूर से एक - दूजे को
बस यही काम हमारा रोजाना था
मै तो था एक परदेशी 
वापस मुझको तो आ जाना था
दूर हुए हम एक - दूजे से 
फिर नहीं हमे मिल पाना था
आज सबेरे खिड़की से देखा
मौसम बड़ा सुहाना था 
देख कर ऐसे मौसम को
उस अल्हड सी, प्यारी सी लड़की की
भोली सी सीधी साधी सी लड़की की 
याद मुझे तो आना था 
आज सबेरे जब खिड़की से देखा
मौसम बड़ा सुहाना