आज सबेरे जब खिड़की से देखा
मौसम बड़ा सुहाना था
ऐसे मौसम को देख कर
जरुरी याद किसीका आना था
एक अल्हड सी, पगली सी लड़की
नटखट सी, शर्मीली सी लड़की
मेरे पड़ोस में रहती थी
उम्र थी उसकी 19 की
पर हरकत बच्चों सी वो करती थी
शाम सबेरे चुपके - चुपके
दूर से देखा करती थी
रोज सबेरे किसी ना किसी बहाने
घर भी आया करती थी
कहना था शायद उसको
जाने क्यों ना कह पाती थी
एक अल्हड सी, पगली सी लड़की
नटखट सी, शर्मीली सी लड़की
मेरे पड़ोस में रहती थी
ताकता रहता था मै भी उसको
उसकी हर अदा का मै दीवाना था
घंटों बैठ सड़क किनारे
इंतजार मै उसका करता था
जिस सड़क से उसका आना जाना था
तकते रहना दूर से एक - दूजे को
बस यही काम हमारा रोजाना था
मै तो था एक परदेशी
वापस मुझको तो आ जाना था
दूर हुए हम एक - दूजे से
फिर नहीं हमे मिल पाना था
आज सबेरे खिड़की से देखा
मौसम बड़ा सुहाना था
देख कर ऐसे मौसम को
उस अल्हड सी, प्यारी सी लड़की की
भोली सी सीधी साधी सी लड़की की
याद मुझे तो आना था
आज सबेरे जब खिड़की से देखा
मौसम बड़ा सुहाना