Thursday, December 27, 2012

हम युवा ही असली शक्ति है


हम पानी में आग लगा सकते हैं,
हम पत्थर पे फूल खिला सकते हैं,
हम बदल सकते है तक़दीर तुम्हारी,
झुका सकते है क़दमों में दुनिया सारी,

हम युवा ही असली शक्ति है,
बाकी सब तो मिटटी है.
युवा ही था वो वीर भगत, सुखदेव और राजगुरु
श्रधा से हर शीस जिसके आगे झुकती है

याद करो उस खुदीराम,
अंग्रेजो ने फंसी पर जिसे चढ़ाया था,
उम्र थी केवल 19 की,
आजादी की अलख उसने जगाया था.

हमने जो एक बार ठान लिया तो
कुछ भी हम कर जाते है
चट्टानों के सीनों को भी,
चिर के राहे हम बनाते है,

हम पानी में आग लगा सकते हैं
हम पत्थर पे फूल खिला सकते हैं
हम युवा ही असली शक्ति है
बाकी सब तो मिटटी है.

Sunday, December 2, 2012

घर का आँगन


आज कहाँ वो घर का आँगन
जो अंतहीन सा लगता था ???
कभी क्रिकेट तो कभी कबड्डी
का मैदान जो बनता था

हर घर की चारदीवारी में
एक नया जहान सा बसता था
दादा-दादी, मम्मी-पापा,
चाचा-चची, दीदी-बुआ
चहू दिशा से घर का हर दरवाजा
आ कर वही खुलता था

सर्दी की सुबह हो या
गर्मी की रातें
या फिर हो सावन की बरसातें
हर मौसम वही गुजरता था

गूंजता करता था देवर-भाभी की हास्य बम
तो सास-बहु, नन्द-भाभी में
शीत युद्ध भी होता था
आफत सी मच जाती थी घर में
जब बच्चा कोई रोता था

तब होता था एक बूढ़ा चापाकल
जो प्यास सभी की बुझाता था
जलता था एक ही मिटटी का चूल्हा
पर भूखा नहीं कोई सोता था

आँगन नहीं वो एक धुरी थी
जो हमको बांधे रखता था
धीरे-धीरे घटता गया
टुकड़ों में बांटता गया

आज कहाँ वो घर का आँगन
जो अंतहीन सा लगता था ????