कमबख्त दिल न जाने क्या कर बैठता है
है जिसे पाना मुश्किल उसी पर मर मिटता है
है जिसे पाना मुश्किल उसी पर मर मिटता है
हस्ती भुला कर ये अपनी,
किसीको दुनिया बना लेता है
सपनों में अपने उसी को सजा लेता है
यादो को उसकी पलकों में बसा लेता है
आँखों को उसकी आइना बना लेता है
कम्बखत दिल न जाने क्या कर बैठता है
हाँथ बढाकर चाँद को तोडना चाहता है
जो हो नामुमकिन,
या वही करना चाहता है
ख्वाब देखता है ये ऐसा
जो कभी पूरा ही ना हो
कमबख्त दिल ना जाने क्या कर बैठता है.........
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