Thursday, January 24, 2013

बेटी नहीं अभिशाप है


क्या कुसूर है उस नन्ही सी जान का ??
उसका तो नहीं अभी इस दुनिया में जान पहचान का














दे रहे हो उसे सजा किस बात की ??
उसे तो जरुरत है तुम्हारे ममता  भरे हाँथ की

खुद पर करो थोड़ी सी  शर्म
उस नन्ही जान पर करो कुछ तो रहम

दो मौका इसे पलने बढ़ने का
ये तो है एक नन्ही कली
दो मौका इसे खिलने का

आज बगिया तुम्हारी महकाएगी
कल एक नयी दुनिया को भी सजाएगी

जग में जो ये आ जाएगी
तो तेरा ही मान बढ़ाएगी

पहुचेगी कोई चाँद पर तो
तो कोई हिमालय पर तिरंगा लहराएगी

बेटी नहीं अभिशाप है
जीवनचक्र की एक शाख है

देखा नहीं उसने तो अभी चेहरा आज का
क्यों बना रहे उसे तुम पन्ना इतिहास का

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