Sunday, September 2, 2012

कशमकश


मेरी भी चाहत वही थी, जो तेरी ख्वाईश थी 
मचल रहे थे दो दिल अरमानो के तूफान लिए 
पर ना तुम कुछ कह सके, ना मेरे ही लब हिले 

हो रही थी बातें आँखों आँखों में

बेजुबान हम घंटों बैठे रहे, जैसे कि हो हमारे लब सिले 

छाई थी बड़ी गहरी ख़ामोशी 

इंतजार तुम्हे था मेरे कुछ कहने का, 
मै सोच रहा था कि शायद तुम कुछ कहो 

लब खामोश दिल बैचैन 

और चाहत थी कि तुम युहीं सामने बैठी रही 

फासले जो थे हमारे दरमियाँ, वो बस वक्त की जोर आजमाईश थी 

न हम कदम बढ़ा सके, ना एक कदम तुम चल सके ||

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