आज कहाँ वो घर का आँगन
जो अंतहीन सा लगता था ???
कभी क्रिकेट तो कभी कबड्डी
का मैदान जो बनता था
हर घर की चारदीवारी में
एक नया जहान सा बसता था
दादा-दादी, मम्मी-पापा,
चाचा-चची, दीदी-बुआ
चहू दिशा से घर का हर दरवाजा
आ कर वही खुलता था
सर्दी की सुबह हो या
गर्मी की रातें
या फिर हो सावन की बरसातें
हर मौसम वही गुजरता था
गूंजता करता था देवर-भाभी की हास्य बम
तो सास-बहु, नन्द-भाभी में
शीत युद्ध भी होता था
आफत सी मच जाती थी घर में
जब बच्चा कोई रोता था
तब होता था एक बूढ़ा चापाकल
जो प्यास सभी की बुझाता था
जलता था एक ही मिटटी का चूल्हा
पर भूखा नहीं कोई सोता था
आँगन नहीं वो एक धुरी थी
जो हमको बांधे रखता था
धीरे-धीरे घटता गया
टुकड़ों में बांटता गया
आज कहाँ वो घर का आँगन
जो अंतहीन सा लगता था ????
Nice........vry nice
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