Saturday, August 8, 2015

क्या हुआ अगर हम मुस्कुरा न सकें....


तुझे इल्जाम दूँ कैसे मेरी जिंदगी
जरूर कमी मुझ में ही रही होगी ।।

यूँ बेवजह तो ठोकर लगा करती नहीं
जरूर आँखें मेरी ही बंद रही होंगी ।।

तू मुझसे जुदा हो गयी
या कोई और तेरे करीब आ गया,
इसमें खता तेरी नहीं
जरूर मैं ही तुझे अपना बना न सका ।।

हँसती - खिलखिलाती रहे तू खुदा करे
क्या हुआ जो हम मुस्कुरा न सके ।।

Friday, July 17, 2015

मुझे अपने पास बुला ले माँ

तन्हा बहुत हूँ तेरे बिना,
आकर गले लगा ले माँ ।।

रह ना सकूँ दूर अब मैं तुझसे,
मुझे आँचल में छुपा ले माँ ।।

सोई नहीं वर्षों से मेरी आँखें,
मुझे गोद में अपने सुला ले माँ।।

कमी नहीं कुछ, फिर भी भूख हूँ मैं,
रुखा - सुखा ही सही अपने हांथों से कुछ खिला दे माँ ।।

भूल हुई जो दूर मैं आया,
मेरी भूल को तू भुला दे माँ ।।

दौलत - शौहरत की नहीं चाह मुझे अब,
बस अपने पास बुला ले माँ ।।
मुझे अपने पास बुला ले माँ.........।।

Sunday, February 3, 2013

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
किसी मिल जाती है जहाँ भर की खुशियाँ
किसी को एक मुस्कान तक नहीं मिलता
हर किसी को वफ़ा के बदले वफ़ा नहीं मिलता

किसी को मिल जाती है यूँ ही मंजिल
किसी को कारवां तक नहीं मिलता
वो दौर और था जब दो जिस्म एक जान हुआ करते थे
आज साथ क्या, तेरा साया भी नहीं मिलता

जैसे कितनी भी गहराई से लिख लो दास्ताँ दिल की
आँधियों के बाद रेत पर कोई निशान नहीं मिलता  

Friday, January 25, 2013

बेटी है तो कल है

माँ, बीवी और बहन है बेटी
घर - आँगन और जीवन जो महका देती
सुगन्धित फूलों का वो उपवन है बेटी


















कली सी कोमल, फूलों सी नाजुक
प्रकृति का अनमोल सृजन है बेटी

नीरस से वीरान जीवन में
सुर की गंगा जो बहा देती
सात सुरों का सरगम है बेटी

जब छाता जीवन घनघोर अँधेरा
और नजर न आती रह कोई
तब उम्मीद की आखिरी किरण है बेटी

दुःख संताप की कठिन घडी में
मुस्काता दर्पण है बेटी

बिन बेटी संभव नहीं है
कर पाना इस सृष्टि की कल्पना
बीज अंकुरित होता जहाँ से जीवन का
वो धरा वो गगन है बेटी

बोझ नहीं ये पाप नहीं
जन्म जन्मों के शुभ कर्मों ये तो फल है
बेटी है तो कल है
बेटी है तो कल है

Thursday, January 24, 2013

बेटी नहीं अभिशाप है


क्या कुसूर है उस नन्ही सी जान का ??
उसका तो नहीं अभी इस दुनिया में जान पहचान का














दे रहे हो उसे सजा किस बात की ??
उसे तो जरुरत है तुम्हारे ममता  भरे हाँथ की

खुद पर करो थोड़ी सी  शर्म
उस नन्ही जान पर करो कुछ तो रहम

दो मौका इसे पलने बढ़ने का
ये तो है एक नन्ही कली
दो मौका इसे खिलने का

आज बगिया तुम्हारी महकाएगी
कल एक नयी दुनिया को भी सजाएगी

जग में जो ये आ जाएगी
तो तेरा ही मान बढ़ाएगी

पहुचेगी कोई चाँद पर तो
तो कोई हिमालय पर तिरंगा लहराएगी

बेटी नहीं अभिशाप है
जीवनचक्र की एक शाख है

देखा नहीं उसने तो अभी चेहरा आज का
क्यों बना रहे उसे तुम पन्ना इतिहास का

Thursday, December 27, 2012

हम युवा ही असली शक्ति है


हम पानी में आग लगा सकते हैं,
हम पत्थर पे फूल खिला सकते हैं,
हम बदल सकते है तक़दीर तुम्हारी,
झुका सकते है क़दमों में दुनिया सारी,

हम युवा ही असली शक्ति है,
बाकी सब तो मिटटी है.
युवा ही था वो वीर भगत, सुखदेव और राजगुरु
श्रधा से हर शीस जिसके आगे झुकती है

याद करो उस खुदीराम,
अंग्रेजो ने फंसी पर जिसे चढ़ाया था,
उम्र थी केवल 19 की,
आजादी की अलख उसने जगाया था.

हमने जो एक बार ठान लिया तो
कुछ भी हम कर जाते है
चट्टानों के सीनों को भी,
चिर के राहे हम बनाते है,

हम पानी में आग लगा सकते हैं
हम पत्थर पे फूल खिला सकते हैं
हम युवा ही असली शक्ति है
बाकी सब तो मिटटी है.

Sunday, December 2, 2012

घर का आँगन


आज कहाँ वो घर का आँगन
जो अंतहीन सा लगता था ???
कभी क्रिकेट तो कभी कबड्डी
का मैदान जो बनता था

हर घर की चारदीवारी में
एक नया जहान सा बसता था
दादा-दादी, मम्मी-पापा,
चाचा-चची, दीदी-बुआ
चहू दिशा से घर का हर दरवाजा
आ कर वही खुलता था

सर्दी की सुबह हो या
गर्मी की रातें
या फिर हो सावन की बरसातें
हर मौसम वही गुजरता था

गूंजता करता था देवर-भाभी की हास्य बम
तो सास-बहु, नन्द-भाभी में
शीत युद्ध भी होता था
आफत सी मच जाती थी घर में
जब बच्चा कोई रोता था

तब होता था एक बूढ़ा चापाकल
जो प्यास सभी की बुझाता था
जलता था एक ही मिटटी का चूल्हा
पर भूखा नहीं कोई सोता था

आँगन नहीं वो एक धुरी थी
जो हमको बांधे रखता था
धीरे-धीरे घटता गया
टुकड़ों में बांटता गया

आज कहाँ वो घर का आँगन
जो अंतहीन सा लगता था ????