Wednesday, January 18, 2012

दिल तोड़ने वाले क्यों तुझको ये अहसास नहीं

दिल तोड़ने वाले क्यों तुझको ये अहसास नहीं,
टूटे हुए दिल में रहती कोई आस नहीं,
दिल तो एक शीशा है, ठोकर नहीं सह सकता है,
ठोकर लगे टूट कर चूर हो जाता है,
दिल तो एक मंदिर है,
इसकी मूरत बना कर तुमको पूजा था,
इस मंदिर के देवता ने ही मंदिर को फूंक डाला,
शीशा जो टूटे अगर थोड़ी सी होती आवाज भी,
दिल के टूटने पर होती नहीं आवाज कोई,
दिल तोड़ने वाले क्यों तुझको ये अहसास नहीं,
टूटे हुए दिल में रहती कोई आस नहीं,
दीवाना था ये दिल जो तुझसे मुहब्बत कर बैठा,
दुनियां के रस्मों से अनजान, खुद से बगाबत कर बैठा,
दुनिया की इन टेढ़ी-मेढ़ी राहों पर चलने की हिमाकत कर बैठा,
ठोकर लगी तो समझा, ये दुन्याँ नहीं दीवानों की,
दीवानगी केलिए यहाँ कोई जगह नहीं,
दिल तोड़ने वाले क्यों तुझको ये अहसास नहीं,
टूटे हुए दिल में रहती कोई आस नहीं,
जिसपे भी किया भरोसा, उसने ही दिया धोखा,
मुझे धोखा देने वाले, क्या दिल तेरे पास नहीं.....??
फिर क्यों तुझको ये अहसास नहीं,
टूटे हुए दिल में रहती कोई आस नहीं,
जब तू था पास मेरे, तो लगती थी दुनिया बड़ी हसीं,
अब तो तुझसे मिलने की भी बाकि कोई आस नहीं,
नादान था ये दिल, नादानी की सजा मिल गयी,
समझाया बहुत इस दीवाने को,
इसको तो मुझे जरा भी था विश्वास नहीं,
दिल तोड़ने वाले क्यों तुझको ये अहसास नहीं,
टूटे हुए दिल में रहती कोई आस नहीं,

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