Sunday, January 29, 2012

ये जीवन तो नश्वर है, इसका क्या मै अभिमान करू

ये जीवन तो नश्वर है,
इसका क्या मै अभिमान करू??
सार्थक ये हो सकता है
अगर जनहित में श्रमदान करूँ.....
अंधकार बहुत है इस दुनिया में,
क्यों न किसी घर का रोशनदान बनूँ .....
माना दुनिया मै बदल सकता नहीं,
कोशिश है कि दो चेहरों पे मै मुस्कान भरूँ......
सच की मै राह चलूँ......
सच का ही मै गुणगान करूँ......
काम करूँ मै कुछ ऐसा
जिससे एक अच्छा इंसान बनूँ......
बेबश और लाचारों का जिससे मै अभिमान बनूँ.....
हिंदू, मुसिलिम हो या सीख ईसाई
गुजरती मराठी हो या बंगाली बिहारी,
कोई भी अलग कैसे है?
जब खुद को माँ भारती की संतान कहूँ
ये जीवन तो नश्वर है,
इसका क्या मै अभिमान करूँ ??

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