Monday, October 8, 2012

माँ है तेरा आशीष बहुत



क्यों इतने दुःख सहती है ??
क्यों इतने कष्ट तू सहती  ??

माँ है तेरा आशीष बहुत 
जो हर संकट से मुझे बचाती है 

माँ तू मेरे लिए 
क्यों व्रत नए तू रखती है ??

देख के तुझको पीड़ा में 
दिल मेरा माँ रोता है 

धिक्कारता है मुझको मेरा मन 
कैसे चैन से तू सोता है ?

क्यों इतने दुःख सहती है ??
क्यों इतने कष्ट तू सहती ??

पा लेता हू जन्नत का सुख 
जब सर मेरा तू सहलाती है  

दूर हो जाती हर बाधा परेशानी 
जब गले तू मुझको लगाती है 

फिर माँ तू मेरे लिए 
क्यों व्रत नए तू रखती है ??

क्यों इतने दुःख सहती है ??
क्यों इतने कष्ट तू सहती है ??

Sunday, October 7, 2012

दोराहे पर खड़ा हूँ मैं


दोराहे पर खड़ा हूँ मैं
समझ में ना आये किधर को जाऊ
इधर को जाऊ या उधर को जाऊ
आखिर मैं किधर को जाऊ

ना कोई साथी ना हमसफ़र है
किसको मैं हमराह बनाऊ
मंजिल मेरी दूर बहुत है
और बढ़ी मुश्किल इसकी डगर है

सफ़र अकेला कटेगा कैसे
कैसे मिलेगी मंजिल मुझको

साथी मिले थे राहों में जो
किसी मोड़ पर छुट गए है
भटक गया हूँ राह मैं या
वो मुझसे रूठ गए है

एक राह में जज्बातों की
एक रहा है अरमानो की
इस दुविधा घिरा हुआ हूँ
आखिर किस राह को अपनाऊ

दोराहे पर खड़ा हूँ मैं
समझ में ना आये किधर को जाऊ
इधर को जाऊ या उधर को जाऊ
आखिर मैं किधर को जाऊ

Saturday, September 29, 2012

बंदिश-ए-जिंदगी

आज फिर शरारत करने को दिल चाहता है
बंदिश-ए-जिंदगी मगर इसकी इजाजत नहीं देती

बिताना चाहता हूँ फिर रात तारों की छाँव में
उस नीले गगन के निचे
ये छत मगर किसी और का है

झूम लेना चाहत हूँ रिमझिम बरसती फुहार में
झूठी शान-ओ-शोकत मगर इसकी इजाजत नहीं देती


रंगीनियाँ ही रंगीनियाँ है इस शहर के चप्पे - चप्पे में
इस दिले-ए-नादान से गाँव की  गलियाँ भुलाई नहीं जाती


सोचता हूँ लौट आऊं फिर उन्ही गांव की गलियों में
तमन्ना-ए-बुलंदी मगर इसकी इजाजत नहीं देती

आज फिर शरारत करने को दिल चाहता है
बंदिश-ए-जिंदगी मगर इसकी इजाजत नहीं देती

Thursday, September 6, 2012

तेरे लौट आने की आश लिए बैठा हूँ मैं


ख्याल जब भी आता है तेरा
तो मचल जाता हूँ  मै

खंजर जब चलते है तेरी यादों के
तो संभल नहीं पता हूँ मैं

ये इश्क नहीं तो और क्या है ?
क्यों पल - पल तेरे बारे में सोचता हूँ मैं

भले ही खबर ना हो तुझे
ख्वाबों में भी अक्सर आवाज लगता हूँ मैं

अगर यकीं नहीं है तो, अपनी सखियों से पूछो
तेरी गांव की गलियों में, उस पनघट किनारे
कुछ पल रोज बिताता हूँ मैं

जिंदगी जो बची है कुछ पल की
तेरी यादों में गुजरता हु मैं

ये कहते है यार मेरे
तू हो चुकी है किसी और की
मगर फिर भी
तेरे लौट आने की आश लिए बैठा हूँ मैं

Sunday, September 2, 2012

कशमकश


मेरी भी चाहत वही थी, जो तेरी ख्वाईश थी 
मचल रहे थे दो दिल अरमानो के तूफान लिए 
पर ना तुम कुछ कह सके, ना मेरे ही लब हिले 

हो रही थी बातें आँखों आँखों में

बेजुबान हम घंटों बैठे रहे, जैसे कि हो हमारे लब सिले 

छाई थी बड़ी गहरी ख़ामोशी 

इंतजार तुम्हे था मेरे कुछ कहने का, 
मै सोच रहा था कि शायद तुम कुछ कहो 

लब खामोश दिल बैचैन 

और चाहत थी कि तुम युहीं सामने बैठी रही 

फासले जो थे हमारे दरमियाँ, वो बस वक्त की जोर आजमाईश थी 

न हम कदम बढ़ा सके, ना एक कदम तुम चल सके ||

Friday, July 20, 2012

माँ सच में है तू तो महान


माँ सच में है तू तो महान, तेरे बच्चो में बसती है तेरी जान
बड़ी जतन से पाले बच्चों को, जान से भी ज्यदा रखे उनका ध्यान, 
दुःख से भरा है तेरा जीवन होठों फिर भी होता मुस्कान,
चोट लगे जब भी तेरे बच्चों को निकल जाते है तेरे प्राण,
ममता तेरी ना जो पहचान सका होगा वो कोई बड़ा ही नादान,
साया तेरा सारा साथ है हर पल छोड़ के तुझको जाऊं कहाँ मैं तेरे बिना है जग सुनसान 
होता खुदा क्या मैं क्या जानूँ तुझसे बढ़ कर नहीं कोई भगवान,
गोद में तेरी दुनियां सारी आँचल में तेरे है ये आसमान 
कैसे करूँ शब्दों में मैं तेरा गुणगान, माँ सच में है तू तो महान....!!!

Tuesday, May 1, 2012

पहले खुद को तुम बदल कर देखो

मंजिल नहीं आसान कोई,
कभी पैदल सफर बिता कर देखो

दर्द होता क्या औरो का
कभी ठोकर तुम खा कर देखो

सोना अगर है गहरी नींद में तो
मेहनत को अपना कर देखो

कीमत पता लगानी हो जो, रोटी के एक टुकड़े की तो
एक दिन भूखा बिता कर देखो

क्यूँ कहते है जल है जीवन
कभी प्यास को गले लगा कर देखो

लगेगी हर एक मुस्कान किमती
कभी आंसू अपने आँखों से बहा कर देखो

समझ आ जायेगी कीमत सच की
सच की राह अपना कर देखो

बदल जायेगी ये दुनिया लेकिन
पहले खुद को तुम बदल कर देखो